13.3.10
Technology के गुलाम
ऐसा कहा जाता है कि "Technology एक अच्छा सेवक, पर खराब स्वामी है"! इस कहावत को हम सब जानते हैं, पर मानता कोई नहीं ! एक रोता हुआ छोटा बच्चा भी प्यार-दुलार से नहीं अपितु एक मोबाइल को हाथ में दिए जाने पर ही चुप होता है ! किसी और की बात ना करते, अपनी ही बात बताती हूँ ! मैं खुद भी अपनी हर ज़रूरत के लिए किसी तकनीकी उत्पाद पर निर्भर हूँ ! हाल ही में मेरे घर पर इंटरनेट नहीं काम कर रहा था, चाहे मुझे उसका उपयोग बहुत कम ही है, पर फिर भी, मुझे दिनभर अपंग सा महसूस होता रहा ! जोड़-घटाने क लिए केल्कुलेटर, तारीख देखने के लिए एलेक्ट्रॉनिक केलेंडर, यहाँ तक कि 10 सीधी सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए लिफ्ट अति आवश्यक हो गया है ! हाल ही में मैं एक महिला से मिली, जो अपने सारे कार्य स्वयं करती हैं जैसे की, ज़मीन पर बैठ कर खाना पकाना, हाथ से कपड़े, बर्तन धोना और अपने घर का पूरा झाड़ू-पोंच्छा खुद अपने आप ही करना ! वे कहती हैं की इससे उन्हे अन्य महिलाओं की तरह किसी तरह का पीठ दर्द, कमर दर्द, मोटापा, ब्लड प्रेशर आदि शिकायत नहीं रहती है ! ऐसा क्यूँ?? हम इन मशीनों का नहीं, अपितु मशीनें हमारा उपयोग कर रही हैं, हम इनके गुलाम हो चुके हैं !
हम न्यूनतम आवश्यक कसरत नहीं करते हैं और ज़रा सा कुछ काम करने पर नाना प्रकार की पीढ़ायें हो जाती हैं और फिर उसके इलाज के लिए हम डॉक्टर्स के अधीन हो जाते हैं ! देखा गया है कि पुरानी पीढ़ी दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत करती थी, इसका कारण यह है कि वे सभी कार्य स्वयं ही करते थे ! आज पाई जाने वाली सुविधाओं का प्रयोग ना के बराबर होता था ! आज सुविधायें बढ़ गयी हैं तो बीमारियाँ भी बढ़ गयी हैं ! जिन बीमारियों से आज लोगों की मृत्यु होती है, उनके बारे में तो पहले सुना तक भी नहीं गया था. अतः जहाँ तक हो सके, हमें तकनीकी उपकरणों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए ! इससे ना केवल हम इन पर कम निर्भर होंगे, अपितु अपनी सेहत का भी बेहतर ख्याल रख पाएँगे !
- सुचेता शर्मा
sucheta.sharma88@gmail.com
द ग्रीन स्प्राउट जर्नी — बुक रिव्यू
हाल ही में मैने अर्थकेयर बुक्स की ' द ग्रीन स्प्राउट जर्नी ' पढ़ी ! लेखिका सातोको चेटर्जी मूलतः जापान की है और अपने पति और २ बच्चो के साथ पिछले बारह वर्षो से कोलकात्ता में रहती है ! यह किताब उन अनोखे और दिलचस्प प्रयोगों का वर्णन करती है जो सातोको ने अपने बच्चों (मानसी और शांतनु) को प्रकृति के करीब लाने के लिए किए ! इस किताब में बहुत बखूबी वर्णन दिया गया है कि कैसे मानसी और शांतनु ने 'ग्रीन स्प्राउट' नाम का प्रकृति क्लब बनाया, कैसे उन्होने घर के बगीचे को नैसर्गिक रूप दिया, कैसे बीजों का संग्रह कर उन्होनें लोगो को बेचकर अपनी पॉकेट मनी भी कमाई, कैसे उन्होने अपनी एक पत्रिका (children’s magazine) भी निकाली ! इन दोनो बच्चों ने अपनी माँ की सहायता से कपड़े के थैले बनाए, घर में छोटा सा तालाब बनाया, और शिल्प कार्य भी किए ! किताब में प्रयोगों की पूरी जानकारी भी दी गयी है ताकि पढ़ कर भी कोई यह प्रयोग आसानी से कर सकें ! साथ ही उनकी पत्रिका के आठों अंक भी है ! कुल मिलाकर यह किताब एक प्रेरणा स्त्रोत है उन लोगों के लिए जो अपना जीवन प्रयोग करके जीना चाहते है !!
— राहुल हासिजा
rahul_hasija89@yahoo.co.in
— राहुल हासिजा
rahul_hasija89@yahoo.co.in
सिस्टम के बंधनों से मुक्त
'शिक्षा मंत्री ने आज शिक्षा नीति पर अपने सलाहकारों से चर्चा की', '१०वी के पाठ्यक्रम में दो और विषय जोड़े गये', 'जिन छात्रों को परीक्षा में ७०% से कम अंक आए, वह विज्ञान को अपना विषय नहीं चुन सकते'...आदि ! यह है हमारी आज की शिक्षा, जिसका निर्णय लेने का अधिकार शिक्षा प्राप्त करने वाले को छोड़कर सभी को दे दिया गया है ! और यह मुद्दा बार-बार उठाया जाता है कि शिक्षा के इस सिस्टम को बदलना होगा ! पर मेरा यह प्रश्न है कि बदल जाने पर भी तो वह सिस्टम ही रहेगा ना ! सिस्टम यानी पूर्वनिर्धारित ढाँचा, और सिस्टम में बदलाव लाने पर भी वह एक ढाँचा ही रहेगा ! हर इंसान अलग है, और इस भिन्नता को समझने के बजाय हम उन्हें मोम की तरह पिगलाकर अपने सिस्टम में फिट करना चाहते है ! इससे इंसान खुद अपनी पहचान खो देता है और वह सिस्टम का एक पुर्जा बन कर रह जाता है ! ज़रूरत है कि हम बने-बनाए सिस्टम को तोड़ कर खुली सोच से जीना सीखें !
राहुल हासिजा
जीवन पर अतिक्रमण
आज किसी से यह पूछें कि अतिक्रमण क्या है तो उनका जवाब होगा कि अतिक्रमण मानें फुटपाथ और सड़कों पर चाय / फल / सब्जी, सायकल / मोटरसाइकल रेपेरिंग का क़ब्ज़ा है ! पर क्या इन लोगों को अधिकार नहीं के वो अपना जीवन व्यापन कर सकें ! आख़िर हमारी सोच इतनी संकुचित क्यों हो गयी है या कहें कि बना दी गयी है क्योंकि हमारे दिमाग़ पर ही अतिक्रमण कर लिया गया है ! स्टीवन बीको ने बिल्कुल सच ही कहा है कि " The most potent weapon in the hands of oppressor is the mind of oppressed"(अत्याचारी के हाथ में जो सबसे ख़तरनाक हथियार है, वो है उन लोगों का दिमाग़, जिस पर वह अत्याचार कर रहा है ) ! ज्ञान के उपर पाठ्य-पुस्तकों और शिक्षा संस्थानों का अतिक्रमण हो रहा है ! अगर आप के पास एक प्रमाण पत्र है तो आप महा ज्ञानी और नहीं, तो आप गँवार ! अभी पिछले दिनों में तमिल नाडु में एक नया क़ानून बनाया जा रहा था जिसका पुरजोर विरोध हुआ ! यह क़ानून यह कहता है कि सिर्फ़ कृषि विशेषज्ञ ही किसी किसान को सलाह दे सकेंगे ! मतलब भले आप जन्मजात किसान हैं और अपनी पुरखो से मिले ज्ञान से खेती कर रहे है, पर आपके पास कृषि विशेषज्ञ होने का प्रमाण-पत्र नहीं हैं तो आप किसी को खेती का ज्ञान नहीं बाँट सकते !
आज आपसी समझ और अनुभव पर विज्ञान का अतिक्रमण होता जा रहा है ! क्या यह भी विज्ञान हमें बताएगा कि माँ का दूध सर्वोत्तम है, जैविक भोजन रसायनिक भोजन से बेहतर है, या फिर बच्चों को प्रकृति के नज़दीक रखने से विकास जल्दी होता है ! अब तो हमारे भोजन पर भी अतिक्रमण हो गया है ! पिछले दिनों बि.टी. बैंगन को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नामंज़ूर कर दिया तो भारत सरकार को लगा कि यह तो विज्ञान का अपमान है और उन्होने लगे हाथ मोनसेंटो और अन्य बायोटेक कंपनियों की सहयता के उद्देश्य से एक बिल पारित करने का प्रस्ताव रखा ! इस बिल की ख़ास बात यह है कि अगर आप बिना वैज्ञानिक प्रमाणों के बी.टी. का विरोध करते हैं, तो आपको ६ माह की जेल और २ लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है ! उसी प्रकार टी.वी. का अतिक्रमण हमारे मनोरंजन पर हो रहा है, न्याय पर क़ानून व्यवस्था का अधिकार हो गया है !
- दिनेश कोठारी
dineshkothari1@gmail.com
साथ में सीखते परिवार
हाल ही में १२ से १६ फ़रवरी को इंदौर में स्नेह(इंदौर) और शिक्षांतर(उदयपुर) ने 'साथ में सीखते परिवार' का आयोजन किया, जिसमें भारत के कई परिवार शामिल हुए ! इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य परिवारों का एक दूसरे से सीखना था ! यह परिवार एक मायने में अलग थे ! इन्होने अपने परिवार में कुछ ऐसे प्रयोग किए थे जो कि काबिल-ए-तारीफ़ थे ! इन सब परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते ! उदयपुर से आए मनीष जैन और विधि जैन की ८ वर्ष पुत्री कन्कु कभी स्कूल नहीं गयी ! वह प्राकृतिक रंग बनाती है, घर के पास चाट के ठेले वाले से चाट बनाना सीखती है ! अहमदाबाद से आए २२ वर्षीय रुचिर कभी स्कूल नहीं गये, वह आज एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर हैं, प्रकृति पर एक पत्रिका(www.care4nature.org) भी निकालते है ! अहमदाबाद से ही आई सुमि ने अपने दोनो बच्चों कुदरत और अजन्मया को कभी स्कूल नहीं भेजा और ना ही कभी कोई दवाई या टीका लगवाया ! उड़ीसा से आए श्याम और बिंदिया ने पिछले एक साल से अपने बच्चो को स्कूल भेजना छोड़ दिया ! श्याम ने, जो खुद आई.आई.एम. और आई.आई.टी. से पढ़े हुए है, अपने बच्चो को स्कूल के बंधन से मुक्त किया और उन्हे वापस सृजनात्मकता पाने का मौका दिया !
उदयपुर से आए २३ वर्षीय मनोज और २२ वर्षीय विकी ने भी स्कूली शिक्षा के बंधनों को तोड़ा और खुद की केटरिंग शुरू की, जिसका नाम उन्होने 'जसो अन्न, वसो मन' रखा ! यहाँ उन्होने बिना तेल इस्तेमाल किए व क्षेत्रीय अन्न जैसे बाजरा, आदि द्वारा भोजन बनाया ! उदयपुर से आए १७ वर्षीय रोहित ने नारियल के टुकड़ो और छिल्को का प्रयोग कर उन से शिल्प-वस्तुएँ बनाई ! उसी प्रकार दिल्ली से आए रजत और अहमदाबाद से आए रवि और ख्याति भी अपने बच्चो को स्कूल नही भेजते ! अंजड़ से आए मुकेश जाट की ५ वर्षीय बच्ची उन्हे खेती-बाड़ी व वार्मी-कंपोस्ट बनाने में मदद करती हैं ! छतरपुर से आए संजय और दमियन्ती ने स्व-उपचार पर अपने प्रयोगों के बारे में जानकारी दी ! इन सब लोगों ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि इन्हें लगा कि शिक्षा बंद कमरों में नहीं, शिक्षक या किताबो में नहीं, परंतु शिक्षा वह है जो कि बच्चे या बड़े मन से सीखें ! आज की स्कूली शिक्षा हमें बने-बनाए ढाँचों में फिट करना चाहती है, जिससे हमारी रचनात्मकता को ठेस पहुचती है और हम अपने आप को समझ ही नहीं पाते ! इन परिवारों ने अपने पहनावे और ख़ान-पान में भी काफ़ी बदलाव किए ! सम्मेलन में सबने अपने भोजन पर भी प्रयोग किए ! इस सम्मेलन में कुछ और अनोखे प्रयोग किए गये जैसे कि साइकल से मिक्सर चलाया, जिससे ये सीखा हमने की बिजली की ज़रूरत को इंवार्टर लगाने के बजाय अपने शरीर की उर्जा का इस्तेमाल कर सकते है ! इंदौर शहर से कई परिवार आए जिन्होने इन प्रयोगों को समझा और आपसी विचारों का आदान—प्रदान किया!
- मिट्टी टीम
उदयपुर से आए २३ वर्षीय मनोज और २२ वर्षीय विकी ने भी स्कूली शिक्षा के बंधनों को तोड़ा और खुद की केटरिंग शुरू की, जिसका नाम उन्होने 'जसो अन्न, वसो मन' रखा ! यहाँ उन्होने बिना तेल इस्तेमाल किए व क्षेत्रीय अन्न जैसे बाजरा, आदि द्वारा भोजन बनाया ! उदयपुर से आए १७ वर्षीय रोहित ने नारियल के टुकड़ो और छिल्को का प्रयोग कर उन से शिल्प-वस्तुएँ बनाई ! उसी प्रकार दिल्ली से आए रजत और अहमदाबाद से आए रवि और ख्याति भी अपने बच्चो को स्कूल नही भेजते ! अंजड़ से आए मुकेश जाट की ५ वर्षीय बच्ची उन्हे खेती-बाड़ी व वार्मी-कंपोस्ट बनाने में मदद करती हैं ! छतरपुर से आए संजय और दमियन्ती ने स्व-उपचार पर अपने प्रयोगों के बारे में जानकारी दी ! इन सब लोगों ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि इन्हें लगा कि शिक्षा बंद कमरों में नहीं, शिक्षक या किताबो में नहीं, परंतु शिक्षा वह है जो कि बच्चे या बड़े मन से सीखें ! आज की स्कूली शिक्षा हमें बने-बनाए ढाँचों में फिट करना चाहती है, जिससे हमारी रचनात्मकता को ठेस पहुचती है और हम अपने आप को समझ ही नहीं पाते ! इन परिवारों ने अपने पहनावे और ख़ान-पान में भी काफ़ी बदलाव किए ! सम्मेलन में सबने अपने भोजन पर भी प्रयोग किए ! इस सम्मेलन में कुछ और अनोखे प्रयोग किए गये जैसे कि साइकल से मिक्सर चलाया, जिससे ये सीखा हमने की बिजली की ज़रूरत को इंवार्टर लगाने के बजाय अपने शरीर की उर्जा का इस्तेमाल कर सकते है ! इंदौर शहर से कई परिवार आए जिन्होने इन प्रयोगों को समझा और आपसी विचारों का आदान—प्रदान किया!
- मिट्टी टीम
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