'शिक्षा मंत्री ने आज शिक्षा नीति पर अपने सलाहकारों से चर्चा की', '१०वी के पाठ्यक्रम में दो और विषय जोड़े गये', 'जिन छात्रों को परीक्षा में ७०% से कम अंक आए, वह विज्ञान को अपना विषय नहीं चुन सकते'...आदि ! यह है हमारी आज की शिक्षा, जिसका निर्णय लेने का अधिकार शिक्षा प्राप्त करने वाले को छोड़कर सभी को दे दिया गया है ! और यह मुद्दा बार-बार उठाया जाता है कि शिक्षा के इस सिस्टम को बदलना होगा ! पर मेरा यह प्रश्न है कि बदल जाने पर भी तो वह सिस्टम ही रहेगा ना ! सिस्टम यानी पूर्वनिर्धारित ढाँचा, और सिस्टम में बदलाव लाने पर भी वह एक ढाँचा ही रहेगा ! हर इंसान अलग है, और इस भिन्नता को समझने के बजाय हम उन्हें मोम की तरह पिगलाकर अपने सिस्टम में फिट करना चाहते है ! इससे इंसान खुद अपनी पहचान खो देता है और वह सिस्टम का एक पुर्जा बन कर रह जाता है ! ज़रूरत है कि हम बने-बनाए सिस्टम को तोड़ कर खुली सोच से जीना सीखें !
राहुल हासिजा
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