आज किसी से यह पूछें कि अतिक्रमण क्या है तो उनका जवाब होगा कि अतिक्रमण मानें फुटपाथ और सड़कों पर चाय / फल / सब्जी, सायकल / मोटरसाइकल रेपेरिंग का क़ब्ज़ा है ! पर क्या इन लोगों को अधिकार नहीं के वो अपना जीवन व्यापन कर सकें ! आख़िर हमारी सोच इतनी संकुचित क्यों हो गयी है या कहें कि बना दी गयी है क्योंकि हमारे दिमाग़ पर ही अतिक्रमण कर लिया गया है ! स्टीवन बीको ने बिल्कुल सच ही कहा है कि " The most potent weapon in the hands of oppressor is the mind of oppressed"(अत्याचारी के हाथ में जो सबसे ख़तरनाक हथियार है, वो है उन लोगों का दिमाग़, जिस पर वह अत्याचार कर रहा है ) ! ज्ञान के उपर पाठ्य-पुस्तकों और शिक्षा संस्थानों का अतिक्रमण हो रहा है ! अगर आप के पास एक प्रमाण पत्र है तो आप महा ज्ञानी और नहीं, तो आप गँवार ! अभी पिछले दिनों में तमिल नाडु में एक नया क़ानून बनाया जा रहा था जिसका पुरजोर विरोध हुआ ! यह क़ानून यह कहता है कि सिर्फ़ कृषि विशेषज्ञ ही किसी किसान को सलाह दे सकेंगे ! मतलब भले आप जन्मजात किसान हैं और अपनी पुरखो से मिले ज्ञान से खेती कर रहे है, पर आपके पास कृषि विशेषज्ञ होने का प्रमाण-पत्र नहीं हैं तो आप किसी को खेती का ज्ञान नहीं बाँट सकते !
आज आपसी समझ और अनुभव पर विज्ञान का अतिक्रमण होता जा रहा है ! क्या यह भी विज्ञान हमें बताएगा कि माँ का दूध सर्वोत्तम है, जैविक भोजन रसायनिक भोजन से बेहतर है, या फिर बच्चों को प्रकृति के नज़दीक रखने से विकास जल्दी होता है ! अब तो हमारे भोजन पर भी अतिक्रमण हो गया है ! पिछले दिनों बि.टी. बैंगन को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नामंज़ूर कर दिया तो भारत सरकार को लगा कि यह तो विज्ञान का अपमान है और उन्होने लगे हाथ मोनसेंटो और अन्य बायोटेक कंपनियों की सहयता के उद्देश्य से एक बिल पारित करने का प्रस्ताव रखा ! इस बिल की ख़ास बात यह है कि अगर आप बिना वैज्ञानिक प्रमाणों के बी.टी. का विरोध करते हैं, तो आपको ६ माह की जेल और २ लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है ! उसी प्रकार टी.वी. का अतिक्रमण हमारे मनोरंजन पर हो रहा है, न्याय पर क़ानून व्यवस्था का अधिकार हो गया है !
- दिनेश कोठारी
dineshkothari1@gmail.com
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