जीवन के साथ प्रयोग करके सीखने का मज़ा कुछ और ही है ! यह प्रयोग कर मैने अपने अंदर मौजूद कुछ मिथको को चुनौती दी और उन्हे तोड़ने में भी सफल रहा ! पहला मिथक था साबून, परफ्यूम, पावडर, टूतपेस्ट आदि तो जीवन के आवश्यक तत्व है ! बचपन से ही इन सब उत्पादों का प्रयोग करने से यह सवाल कभी मंन में नहीं आया की आख़िर क्यों? पर जब २० साल की ओपचारिक शिक्षा के बंधन से छूटने के बाद जब खुद को जानने का समय मिला, तो पाया की साबून, टूतपेस्ट, प्रफ्यूम आदि की आवश्यकता तो मनुष्य को है ही नहीं !
सबसे पहले मैने टूतपेस्ट का इस्तेमाल बंद किया, और उसका वैकल्पिक अपनाया ! कभी नीम की डंडी से तो कभी नमक और सरसो का तेल मिलाकर दातुन किया ! इससे एक बहुत बड़ी बात सामने आई, और वह यह कि सुबह सिर्फ़ एक बार इनका प्रयोग करने से दिन में दूसरी बार दाँत सॉफ करने की कोई आवश्यकता नहीं है, जो की विज्ञापनों में ढिंढौरा पीटकर कहा जाता है ! वैसे दाँतों की पेस्ट के विज्ञापन में यह सिर्फ़ इसलिए कहा जाता है ताकि उनके उत्पाद की बिक्री जल्द से जल्द हो, दाँत साफ करवाना तो सिर्फ़ एक बहाना है ! टूतपेस्ट के उपयोग से शाम तक दांतो पर एक परत बन जाती है जिससे हमे लगता है की दाँतों को साफ करना ही बेहतर होगा, परंतु नीम या सरसो के तेल का उपयोग करने से यह परत नहीं बनेगी ! साबुन की आवश्यकता के उत्तर में सिर्फ़ यही तर्क दिया जा सकता है कि साबून शरीर के मैल को धोने के लिए ज़रूरी है ! यह तर्क दे कर हम अपने शरीर में मौजूद ऐसी ग्रंथियों को नकार देते हैं, जो साबून का काम करती हैं ! जब हम कुछ काम करते हैं तो शरीर से पसीना निकलता है, और यही पसीना हमारे शरीर के मैल को भी बहा ले जाता है ! तो फिर क्या ज़रूरत है साबून की? परफ्यूम और डेयाड्रांट लगाकर निकलना तो शान माना जाता है ! पर परफ्यूम से श्वास में तकलीफ़ और डेयाड्रांट से पसीने की ग्रंथियाँ बंद हो जाती है, जिससे शरीर के अंदर का तापमान बढ़ जाता है जो की शरीर के लिए हानिकारक है ! यह थे मेरे कुछ प्रयोग, अगर आप भी कुछ प्रयोग कर रहे है अपने जीवन में, तो हमारे साथ बाँटिए !
- राहुल हासिजा
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