मिट्टी - एक पहल

इस सृष्टि में रहने वाले हर प्राणी का ताना-बना बुनने वाली जो चीज़ है, वह है 'मिट्टी' ! हमारा अस्तित्व है, क्योंकि इस मिट्टी ने हमारी जड़ो को मजबूती से पकड़ रखा है ! जीवन की अंधी दौड़ में हम उन जड़ो से दूर भागने की कोशिश कर रहे है और द्वेष , ईर्ष्या, लालच, भय की दीवारें खड़ी कर रहे हैं ! पर हमारा निर्माण ही उस मिट्टी से हुआ है, और एक दिन उसी मिट्टी में दफ़न होना है तो फिर जड़ों से दूर भागना कहाँ लाज़मी है ! जिस प्रकार फूलों को अगर जड़ो से उखाड़ दिया जाए तो वह मुरझा जाते हैं, व अधमरे से हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपनी जड़ों से दूर बिल्कुल भी नही रह सकते ! क्या हमने गौर किया है कि जिस भय, पैसे, लोभ, और ईर्ष्या रूपी दीवारों की दुनिया में हम अपना जीवन व्याप्त कर रहे हैं, वह सुकून भरी है या नहीं ! जब हम इस बात पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि हमें ना तो सुकून मिल पाता है ना ही खुशी ! हम इन चार दीवारों में ही इतने व्यस्त हैं कि उसके पार मौजूद खुशियों को महसूस तक नहीं कर पाते ! हमारा समुदाय समाप्ति की कगार पर है, आपसी संवाद ख़त्म हो चुका है और खुशियाँ तितर-बितर हो चुकी हैं ! ऐसे समाज में हम खुद जी रहे हैं और ऐसे ही समाज को हम अपनी आने वाली पीढी को तोहफे के रूप में देने वाले हैं !

हमारा पत्र 'मिट्टी' एक आमंत्रण हैं आप सबको के आए और चले अपनी जड़ो की ओर और महसूस करे अपने जीवन की महक को, जो कहीं खो सी गयी हैं ! यह पहल है एक ऐसा समुदाय स्थापित करने की, जो एक दूसरे को समझे, प्यार मुहब्बत से रहे, न कि अपने बीच दीवारें खड़ी कर दे ! यह पत्र आपका है, व आपके सहयोग से चलाया जाएगा ! अगर आप अपने अनुभव हमारे साथ बाटना चाहते है, किसी भी विषय पर, हमे लिख के भेजिए ! अगर आप लिखकर नही, परंतु बताकर कुछ कहना चाहते है, हमसे संपर्क कीजिए, हम आकर आपकी बाते सब तक पहुचायँगे ! कुछ खाने की विधि हो, या घरेलू नुस्खे, कबाड़ का प्रयोग कर कुछ बनाई जाने वाली चीज़ो का विवरण, या आपके जीवन के अनुभव, हम हमेशा तत्पर रहेंगे आपके विचारो को लोगो तक पहुचाने के लिए ! यह पत्र साप्ताहिक या मासिक प्रकाशित नही होगा, परंतु जब भी आपके सहयोग से लिखने वाली सामग्री उपलब्ध हो जाएगी, तभी प्रकाशित हो जाएगी ! इस पत्र में कोई advertisement नहीं होगी ! हमारा यही प्रयास रहेगा कि आपसी सहयोग से हम इस पत्र का प्रकाशन करें ! अगर आप इस प्रयास में अपना योगदान देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है !

- राहुल हासिजा
संपादक
मिट्टी

27.10.10


नये रूप और नये प्रयोगों के साथ मिट्टी फिर से हाज़िर है आपके सामने ! इस अंक का खाका वारली चित्रकलाओं से भरपूर है ! वारली कला एक प्राचीन भारतीय कला है जो की महाराष्ट्र की एक जनजाति वारली द्वारा बनाई जाती है ! और यह कला उनके जीवन के मूल सिद्धांतो को प्रस्तुत करती है ! इन चित्रों में मुख्यतः फसल पैदावार ऋतु, शादी, उत्सव, जन्म, और धार्मिकता को दर्शाया जाता है ! यह कला वारली जनजाति के सरल जीवन को भी दर्शाती है ! वारली कलाओं के प्रमुख विषयों में शादी का बड़ा स्थान हैं ! शादी के चित्रों में देव, पलघाट, पक्षी, पेड़, पुरुष और महिलायें साथ में नाचते हुए दर्शाए जाते है ! 
 
वहीं, खेती से पैदावार के समय श्रमिक जुताई करते हुए दर्शाया जाता है ! हाल ही के दिनों में मेरा उदयपुर जाना हुआ जहाँ स्वराज यूनिवर्सिटी नाम के एक स्व-चलित व स्व-निर्धारित कार्यक्रम से मेरा जुड़ना हुआ (www.swarajuniversity.org)! इस कार्यक्रम के तहत हम उदयपुर शहर से दूर एक गाँव नयाखेड़ा में एक आश्रम में हमारा कॅंपस था ! उन्हीं दिनों में हुए एक रोचक किस्से का वर्णन मैं करूँगा ! एक दिन हमें यह चुनौती दी गयी कि हमें शाम में दो के समूह में हो कर बिना पैसे और मोबाइल के गाँव जाना है और गाँव वालों से रिश्ता बनाकर उनके घर से रात को खाना खा कर आना है ! मैं सह-खोजी सखी के साथ गाँव गया ! शुरुआत में तो हमारे दिलों-दिमाग़ में सिर्फ़ यही चल रहा था कि भोजन की बात कैसे करेंगे, परंतु गाँव वालों की मेहमान-नवाज़ी से हमें शर्मिंदगी का एहसास हुआ ! वो हम अजनाबीयों को अपनी ज़िंदगी और गाँव के बारे में सब इतना खुल कर बताते, तो हमें शर्म आती कि अगर ऐसा ही शहर में हुआ होता, और कोई हमारे घर पर आता, तो उनके सवालों का जवाब देना तो दूर की बात, उन्हे पानी तक नहीं पिलाया जाता, उल्टा शक भरी निगाहों से घर के बाहर से ही चलता बना कर देते ! उस दिन हम गाँव के बच्चो के साथ खेले और उन बच्चो ने हमें गाँव भी घुमाया ! उन बच्चो की सादगी और मासूमियत देख लगा कि काश...मैं भी वैसा हो पाता ! शहर की चिल्ला-चिल्ली और भागम-भाग वाली ज़िंदगी से कोसो दूर गाँव का सादगी भरा जीवन सुकून दे रहा था और शहरी सुख सुविधाओं के बिना भी उनके चेहरे की चमक और खुशी देख अब मेरा पेट बिन भोजन के तृप्त हो चुका था ! उन्होने हमें मक्‍के की रोटी और सब्ज़ी खिलाई, जो कि लाजवाब थी...वह सुकून भरा माहौल उस परिवार और उन बच्चो के साथ हमेशा यादगार रहेगा !                                                   

-राहुल हासिजा  
rahul_hasija89@yahoo.co.in



ब्रांडेड जीवन



हम एक उदाहरण से जानेंगे कि ब्रांडेड चीज़ो की गणित क्या है और उससे छोटे व्यवसायों पर क्या असर पड़ा है ! मिसाल लेते है ब्रांडेड कपड़ो की, जिनका कपड़ा निम्न श्रेणी का होता है या यह कहे कि इनका जो मूल्य आप चुकाते है वो कहीं ज़्यादा होता है ! ऐसा मानते है की X एक छोटा रेडीमेड कपड़ो का व्यवसाय चलता है और शर्ट्स बनाता है ! अभी तक शर्ट्स की कटिंग के लिए उसके यहाँ पर दो टेलर-मास्टर आते है और सिलाई के लिए भी करीब ५० लोगों को रोज़गार दिया हुआ है ! उसका कच्चा माल करीब शहर की कपड़ा मंडी की कई दुकानों से आता है ! उसके तीन-चार सेल्स-मेन हैं और उसका उत्पाद सीधे-सीधे २०० से ३०० रिटेलर्स को जाता है ! उसके यहाँ पर मनुष्यों को मशीनों की तरह काम नहीं करवाया जाता और कामगार बिना तनाव के काम करते है ! खुद X दुकान पर सिर्फ़ ६-७ घंटे रहता है और बाकी समय परिवार के साथ बिताता है ! अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए वो एक ब्रांडेड रीटेल चेन से संपर्क करता है और वो उससे शर्ट्स खरीदने के लिए शर्तों के साथ एक अनुबंध करता है ! अनुबंध के तहत X को एक कटिंग मशीन, डिज़ाइनिंग कंप्यूटर, और पुरानी की जगह नयी मशीन लगवानी होती है जिसे वह खुशी-खुशी कर्ज़ा ले कर कर लेता है ! शर्तों के तहत कंपनी उसकी उत्पादकता का मूल्यांकन कर उसे कुछ निर्धारित % मुनाफ़े का हिस्सा देगी ! कच्चा माल भी अब कंपनी द्वारा निर्धारित उत्पादकों से ही लेना होता है ताकि लागत और कम आए ! शर्ट्स पर अब बनाने वाले की नहीं, परंतु रीटेलर्स का ब्रांड नाम होता है ! देखने में तो यह सब अच्छा लगता है परंतु, X का जीवन बदल गया है :
* पहले जो उसके कार्य में जिंदगी का रचनात्मक पहलू जुड़ा था, वो चला गया ! अब रीटेलर्स के निर्देश पर वो तैयार करना पड़ता है ! 
* पहले जो कर्मचारियों से मानवीय रिश्ता था वो उत्पादक आधारित हो गया है ! 
* क़र्ज़ के कारण ब्याज़ का बोझ ! 
* X को जो कच्चा माल देने और लेने वाली चेन थी, वह अब टूट चुकी है ! 
* ज़िंदगी में एकरूपता आ गयी है जिससे कुछ लोग कहेंगे कि जीवन में अनुशासन आ गया है, पर सही मायने में तो जीवन का अनुशासन चला गया है ! 
* कर्मचारियों को छुट्टी ना मिलने के कारण चिड-चिड़ापन आ जाता है !
* और सबसे बड़ा नुकसान जो हुआ है, वह है कि X के व्यापार की चेन में करीब ३०० परिवार और १५०० लोग जुड़े थे, वो सारा का सारा व्यापार एक रीटेल चेन और कुछ मुट्ठी भर लोगों ने हथिया लिया है !पैसे पर किसी एक का नियंत्रण होना और बाकी सब उसकी कट्पुतली... क्या यह सही है? अपने विचार हमें लिख भेजिए !

दिनेश कोठारी
<dineshkothari1@gmail.com>

जसो अन्न वसो मन





नमस्कार मेरे प्रिय दोस्तों, मैं पिछ्ले कुछ सालों से स्वास्थ्यपूर्ण भोजन और स्थानीय अनाजों पर प्रयोग कर रहा हूँ और इसी के साथ हमनें एक समूह की स्थापना कि जिसका नाम है ' जसो अन्न वसो मन' ! क्या है जसो अन्न वसो मन? जो हम खाते है, वही हम बनते है ! जो हम खाते है वही हमारे दिल, दिमाग़ और भावनाओं का हिस्सा बनता है ! हम मानते है कि एक सजीव ही दूसरे सजीव को पोषण दे सकता है ! इसलिए हम अपने भोजन को कम से कम प्रोसेस करते है और पकाते है ! हम मानते है कि भोजन ऐसा होना चाहिए जो जल्दी पच सके, वरना पेट में रहकर सड़ता है और ज़हर पैदा करता है ! शरीर से जहर फेंकने की प्रक्रिया एक ऐसा रूप लेती है जिसे हम बीमारी कहते है ! हमें यह देखना है कि हमारे शरीर में ज़हर ना बने और शरीर से ज़हर बाहर निकलने की प्राकृतिक प्रक्रिया में कोई रुकावट न हो ! इसी सोच को लेकर हम ने कई प्रयोग किए है और कई उत्सव और सम्मेलनों में इस प्रकार का खाना बनाया और अनुभव किया कि नियमित रूप से इस तरह के भोजन से हमारे अपने स्वास्थ्य में काफ़ी बदलाव आया है तथा कई लोगों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है ! इस भोजन की विशेषतायें : * कच्चा एवं भाप से पकाया हुआ :प्राकृतिक रूप से अनाज, सब्ज़ियों में एन्ज़ाइम्स होते है, जो हमारी पाचन क्रिया के लिए महत्वपूर्ण होते है ! खाने को उबालने, तलने एवं माइक्रोवेव में पकाने से उनके एन्ज़ाइम्स एवं पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते है ! अतः हम भोजन को अधिकाधिक विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट सलाद के रूप में तथा भाप से पकाते है ! * देशी गुड़ का प्रयोग: सफेद शक्कर हमारे खून में शक्कर की मात्रा को बढ़ाती है जिसकी वजह से डयबिटीज़ जैसी बीमारियाँ होती है ! शक्कर बनाने की प्रक्रिया में बहुत सारे केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है ! हमें इसके बजाय भोजन में केमिकल रहित देशी गुड़ इस्तेमाल करना चाहिए ! * स्थानीय एवं विविध प्रकार के अनाज : हमारे बुजुर्ग लोग अपने भोजन में कई प्रकार के अनाज खाते थे, लेकिन पिछ्ले ३० सालों से केवल गेहूँ के उपभोग पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है ! गेहूँ में ग्लूटिन नामक प्रोटीन होता है जिसका पाचन बहुत मुश्किल से होता है ! इसलिए हम गेहूँ के बजाय मक्का, बाजरा, ज्वार, राजगीरा, सांवा एवं लाल चावल का प्रयोग करते है जी पचाने में आसान होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होते है ! * सूखे मेवे का प्रयोग : गाय का दूध संपूर्ण आहार है, पर केवल उसके बछढ़े के लिए ! प्रकृति में कोई भी जीव अपनी माँ के अलावा किसी और का दूध नहीं पिता है और एक उम्र के बाद वह दूध का सेवन बिल्कुल बंद कर देता है ! तो हम भी प्रयास करते है कि प्रकृति में उपलब्ध सूखे मेवों का दूध इस्तेमाल करें, जैसे मूँगफली एवं नारियल का दूध ! * तेल बिल्कुल नहीं : तिलहनी बीजों (तिल, मूँगफली आदि ) में उनको पाचाने के लिए आवश्यक एन्ज़ाइम्स मौजूद होते है लेकिन तेल बनाने की प्रक्रिया में एन्ज़ाइम्स एवं फयबर्स (रेशे) ख़त्म हो जाते है ! * कचरा मुक्त : डिब्बा बंद भोजन के प्रचलन एवं आधुनिक भोजन के तौर-तरीकों में इतना प्लास्टिक, थर्माकौल एवं हानिकारक कबाड़ काम में लाया जाता है जो दिनों-दिन हमारे आस-पास शहर एवं संपूर्ण धरती के लिए बहुत बड़ा बोझ बनता जा रहा है ! हम अपने भोजन तथा पूरे आयोजन को कचरा मुक्त बनाने का प्रयास कर रहे है ! हम आपको आमंत्रित करते है कि अगर आप अपने किसी कार्यक्रम, मीटिंग, सम्मेलन, कार्यशाला, उत्सव, निजी कार्यक्रमों के आयोजन में पौष्टिक भोजन बनवाना चाहते है या अधिक समझ बढ़ाना चाहते है तो संपर्क करें :


- मनोज प्रजापत
09928443548, 09636430162

मेरे सवाल

मेरा कोई सवाल नहीं , अगर हो पेड़ हरे -भरे  
मेरा कोई सवाल नहीं , सब जगह हो मुबलक पानी, 
मेरा कोई सवाल नहीं, कोई निकाले समुद्रसे नमक ,
मेरा कोई सवाल नहीं, सबको मिले शुद ऑक्सीजन ,
मेरा कोई सवाल नहीं, अगर अमर रहे पृथ्वी 
लेकिन मेरा सवाल है 

हाँ मेरा  सवाल है, आप सभी लोगो से ,
हाँ मेरा सवाल है, अगर काटेगा कोई हरे-भरे पेड़ को,
हाँ मेरा सवाल है, अगर मारेगा समुद्र के जिव -जन्तुओ को, 
हाँ मेरा सवाल है, अगर कोई मिलायेगा हवा में ज़हर
हाँ मेरा सवाल है, अगर कोई करता पुथ्वी को घायल ,
हाँ मेरा सवाल है, आप सभी लोगो से, क्या होगा अपनी आने वाली नयी पीढ़ी का ?

- विजय उबाले 
रूपांकन, इंदौर शहर के ३१, शंकारगंज, किला रोड में मौजूद एक ऐसा सार्वजनिक वाचनालय, जहाँ अंदर प्रवेश करते ही आपका सामना होगा ऐसी कविताओं, ऐसी पंक्तियों व चित्रों से, जो आपके दिल को झकझोड़कर रख दे ! रूपांकन के संचालक श्री अशोक दुबे जी, जो कि पेशे से कलाकार है और केलीग्राफी में महारत है, से हुई कुछ बातचीत का अंश निम्नलिखित है:

प्र: रूपांकन क्या है और इसकी शुरुआत कब और कैसे हुई?

उ: रूपांकन एक सार्वजनिक वाचनालय (लाइब्ररी) है और इसकी शुरुआत २००३ में हुई ! मैं बचपन में दिनभर खेलने के बाद अपने मोहल्ले के वाचनालय में जाया करता था और वहाँ काफ़ी कुछ सीखने को मिलता ! तो सोचा की एक ऐसा केन्द्र शुरू किया जाए जहाँ लोग आकर पत्र, पत्रिकाए व किताबें पढ़ सकें ! कुछ ही समय में आसपास के काफ़ी युवा यहाँ आने लगे तो हम ने ओरिगामी, बाटिक प्रिंटिंग, आदि के शिविर लगाना चालू किए, और साथ ही संगीत व नाटक प्रस्तुतियां भी होने लगी !

प्र: रूपांकन किन-किन गतिविधियों से जुड़ा हुआ है ?

उ: रूपांकन सार्वजनिक वाचनालय संचालन, पोस्टर प्रदर्शनी, अनौपचारिक शिक्षा केंद्र (नींव) का संचालन, कविता व संगीत शिविर, डॉक्युमेंटरी प्रदर्शनी, नुक्कड़ नाटक और कंप्यूटर शिक्षण, आदि कार्यक्षेत्रों से जुड़ा हुआ है ! केंद्र से जुड़े हुए युवाओं ने कुछ सालों तक गाड़िया लोहारा जनजाति के बच्चो को पढ़ाने का जिम्मा भी लिया ! और यही के आसपास इलाक़ों में काफ़ी बॉल-श्रमिक हैं, जो की दारू, सिगरेट, तंबाकू आदि की ग़लत आदतों की चपेट में आ जाते है ! इन्ही बच्चों को भी यहाँ के युवा पढ़ाते है और उन्हे कुछ अक्षर ज्ञान देकर सोच समाज विकसित करने में मदद भी करते है ! उन्ही कुछ बच्चों ने अब अपना खुद का रोज़गार भी डाला ! खजराना मंदिर परिसर में नींव नामक अनौपचारिक शिक्षण केंद्र की स्थापना भी की जहाँ उन बच्चो को पढ़ाया जाता है जो की मंदिर परिसर के आसपास भीख माँगते है !

प्र: रूपांकन का उद्देश्य क्या है और किन-किन मुद्दों पर यह आवाज़ उठाता है ?
उ: हमारा यही एक सपना है कि शोषण मुक्त समाज हो, न्यायपूर्ण व्यवस्था हो और समानता के साथ एक खूबसूरत विश्व में हम सब जी सकें ! भोजन का अधिकार, महिला आरक्षण और अधिकार, युवा व क्रांतिकारी सोच, नर्मदा आदि मुद्दों पर हमारा काम और चर्चा चलती रहती है ! और रूपांकन को चलाने का खर्चा हम टी-शर्ट्स, पोस्टर, पेपर बेग, आदि बेच कर और कुछ साथियों के सहयोग से चलाते है !

रूपांकन
0731-2454440, 0731-2453944

13.3.10

Technology के गुलाम


ऐसा कहा जाता है कि "Technology एक अच्छा सेवक, पर खराब स्वामी है"! इस कहावत को हम सब जानते हैं, पर मानता कोई नहीं ! एक रोता हुआ छोटा बच्चा भी प्यार-दुलार से नहीं अपितु एक मोबाइल को हाथ में दिए जाने पर ही चुप होता है ! किसी और की बात ना करते, अपनी ही बात बताती हूँ ! मैं खुद भी अपनी हर ज़रूरत के लिए किसी तकनीकी उत्पाद पर निर्भर हूँ ! हाल ही में मेरे घर पर इंटरनेट नहीं काम कर रहा था, चाहे मुझे उसका उपयोग बहुत कम ही है, पर फिर भी, मुझे दिनभर अपंग सा महसूस होता रहा ! जोड़-घटाने क लिए केल्कुलेटर, तारीख देखने के लिए एलेक्ट्रॉनिक केलेंडर, यहाँ तक कि 10 सीधी सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए लिफ्ट अति आवश्यक हो गया है ! हाल ही में मैं एक महिला से मिली, जो अपने सारे कार्य स्वयं करती हैं जैसे की, ज़मीन पर बैठ कर खाना पकाना, हाथ से कपड़े, बर्तन धोना और अपने घर का पूरा झाड़ू-पोंच्छा खुद अपने आप ही करना ! वे कहती हैं की इससे उन्हे अन्य महिलाओं की तरह किसी तरह का पीठ दर्द, कमर दर्द, मोटापा, ब्लड प्रेशर आदि शिकायत नहीं रहती है ! ऐसा क्यूँ?? हम इन मशीनों का नहीं, अपितु मशीनें हमारा उपयोग कर रही हैं, हम इनके गुलाम हो चुके हैं !
हम न्यूनतम आवश्यक कसरत नहीं करते हैं और ज़रा सा कुछ काम करने पर नाना प्रकार की पीढ़ायें हो जाती हैं और फिर उसके इलाज के लिए हम डॉक्टर्स के अधीन हो जाते हैं ! देखा गया है कि पुरानी पीढ़ी दीर्घायु एवं स्वस्थ जीवन व्यतीत करती थी, इसका कारण यह है कि वे सभी कार्य स्वयं ही करते थे ! आज पाई जाने वाली सुविधाओं का प्रयोग ना के बराबर होता था ! आज सुविधायें बढ़ गयी हैं तो बीमारियाँ भी बढ़ गयी हैं ! जिन बीमारियों से आज लोगों की मृत्यु होती है, उनके बारे में तो पहले सुना तक भी नहीं गया था. अतः जहाँ तक हो सके, हमें तकनीकी उपकरणों का प्रयोग कम से कम करना चाहिए ! इससे ना केवल हम इन पर कम निर्भर होंगे, अपितु अपनी सेहत का भी बेहतर ख्याल रख पाएँगे !

- सुचेता शर्मा
sucheta.sharma88@gmail.com

द ग्रीन स्प्राउट जर्नी — बुक रिव्यू

हाल ही में मैने अर्थकेयर बुक्स की ' द ग्रीन स्प्राउट जर्नी ' पढ़ी ! लेखिका सातोको चेटर्जी मूलतः जापान की है और अपने पति और २ बच्चो के साथ पिछले बारह वर्षो से कोलकात्ता में रहती है ! यह किताब उन अनोखे और दिलचस्प प्रयोगों का वर्णन करती है जो सातोको ने अपने बच्चों (मानसी और शांतनु) को प्रकृति के करीब लाने के लिए किए ! इस किताब में बहुत बखूबी वर्णन दिया गया है कि कैसे मानसी और शांतनु ने 'ग्रीन स्प्राउट' नाम का प्रकृति क्लब बनाया, कैसे उन्होने घर के बगीचे को नैसर्गिक रूप दिया, कैसे बीजों का संग्रह कर उन्होनें लोगो को बेचकर अपनी पॉकेट मनी भी कमाई, कैसे उन्होने अपनी एक पत्रिका (children’s magazine) भी निकाली ! इन दोनो बच्चों ने अपनी माँ की सहायता से कपड़े के थैले बनाए, घर में छोटा सा तालाब बनाया, और शिल्प कार्य भी किए ! किताब में प्रयोगों की पूरी जानकारी भी दी गयी है ताकि पढ़ कर भी कोई यह प्रयोग आसानी से कर सकें ! साथ ही उनकी पत्रिका के आठों अंक भी है ! कुल मिलाकर यह किताब एक प्रेरणा स्त्रोत है उन लोगों के लिए जो अपना जीवन प्रयोग करके जीना चाहते है !!
— राहुल हासिजा
rahul_hasija89@yahoo.co.in

सिस्टम के बंधनों से मुक्त



'शिक्षा मंत्री ने आज शिक्षा नीति पर अपने सलाहकारों से चर्चा की',  '१०वी के पाठ्यक्रम में दो और विषय जोड़े गये',  'जिन छात्रों को परीक्षा में ७०% से कम अंक आए, वह विज्ञान को अपना विषय नहीं चुन सकते'...आदि ! यह है हमारी आज की शिक्षा, जिसका निर्णय लेने का अधिकार शिक्षा प्राप्त करने वाले को छोड़कर सभी को दे दिया गया है ! और यह मुद्दा बार-बार उठाया जाता है कि शिक्षा के इस सिस्टम को बदलना होगा ! पर मेरा यह प्रश्‍न है कि बदल जाने पर भी तो वह सिस्टम ही रहेगा ना ! सिस्टम यानी पूर्वनिर्धारित ढाँचा, और सिस्टम में बदलाव लाने पर भी वह एक ढाँचा ही रहेगा ! हर इंसान अलग है, और इस भिन्नता को समझने के बजाय हम उन्हें मोम की तरह पिगलाकर अपने सिस्टम में फिट करना चाहते है ! इससे इंसान खुद अपनी पहचान खो देता है और वह सिस्टम का एक पुर्जा बन कर रह जाता है ! ज़रूरत है कि हम बने-बनाए सिस्टम को तोड़ कर खुली सोच से जीना सीखें !                                                                                  
                                                                     राहुल हासिजा      

जीवन पर अतिक्रमण


आज किसी से यह पूछें कि अतिक्रमण क्या है तो उनका जवाब होगा कि अतिक्रमण मानें फुटपाथ और सड़कों पर चाय / फल / सब्जी, सायकल / मोटरसाइकल रेपेरिंग का क़ब्ज़ा है ! पर क्या इन लोगों को अधिकार नहीं के वो अपना जीवन व्यापन कर सकें ! आख़िर हमारी सोच इतनी संकुचित क्यों हो गयी है या कहें कि बना दी गयी है क्योंकि हमारे दिमाग़ पर ही अतिक्रमण कर लिया गया है ! स्टीवन बीको ने बिल्कुल सच ही कहा है कि " The most potent weapon in the hands of oppressor is the mind of oppressed"(अत्याचारी के हाथ में जो सबसे ख़तरनाक हथियार है, वो है उन लोगों का दिमाग़, जिस पर वह अत्याचार कर रहा है ) ! ज्ञान के उपर पाठ्य-पुस्तकों और शिक्षा संस्थानों का अतिक्रमण हो रहा है ! अगर आप के पास एक प्रमाण पत्र है तो आप महा ज्ञानी और नहीं, तो आप गँवार ! अभी पिछले दिनों में तमिल नाडु में एक नया क़ानून बनाया जा रहा था जिसका पुरजोर विरोध हुआ ! यह क़ानून यह कहता है कि सिर्फ़ कृषि विशेषज्ञ ही किसी किसान को सलाह दे सकेंगे ! मतलब भले आप जन्मजात किसान हैं और अपनी पुरखो से मिले ज्ञान से खेती कर रहे है, पर आपके पास कृषि विशेषज्ञ होने का प्रमाण-पत्र नहीं हैं तो आप किसी को खेती का ज्ञान नहीं बाँट सकते !
आज आपसी समझ और अनुभव पर विज्ञान का अतिक्रमण होता जा रहा है ! क्या यह भी विज्ञान हमें बताएगा कि माँ का दूध सर्वोत्तम है, जैविक भोजन रसायनिक भोजन से बेहतर है, या फिर बच्चों को प्रकृति के नज़दीक रखने से विकास जल्दी होता है ! अब तो हमारे भोजन पर भी अतिक्रमण हो गया है ! पिछले दिनों बि.टी. बैंगन को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने नामंज़ूर कर दिया तो भारत सरकार को लगा कि यह तो विज्ञान का अपमान है और उन्होने लगे हाथ मोनसेंटो और अन्य बायोटेक कंपनियों की सहयता के उद्देश्य से एक बिल पारित करने का प्रस्ताव रखा ! इस बिल की ख़ास बात यह है कि अगर आप बिना वैज्ञानिक प्रमाणों के बी.टी. का विरोध करते हैं, तो आपको ६ माह की जेल और २ लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है ! उसी प्रकार टी.वी. का अतिक्रमण हमारे मनोरंजन पर हो रहा है, न्याय पर क़ानून व्यवस्था का अधिकार हो गया है !                               
दिनेश कोठारी    
dineshkothari1@gmail.com

साथ में सीखते परिवार

हाल ही में १२ से १६ फ़रवरी को इंदौर में स्नेह(इंदौर) और शिक्षांतर(उदयपुर) ने 'साथ में सीखते परिवार' का आयोजन किया, जिसमें भारत के कई परिवार शामिल हुए ! इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य परिवारों का एक दूसरे से सीखना था ! यह परिवार एक मायने में अलग थे ! इन्होने अपने परिवार में कुछ ऐसे प्रयोग किए थे जो कि काबिल-ए-तारीफ़ थे ! इन सब परिवारों के बच्चे स्कूल नहीं जाते ! उदयपुर से आए मनीष जैन और विधि जैन की ८ वर्ष पुत्री कन्कु कभी स्कूल नहीं गयी ! वह प्राकृतिक रंग बनाती है, घर के पास चाट के ठेले वाले से चाट बनाना सीखती है ! अहमदाबाद से आए २२ वर्षीय रुचिर कभी स्कूल नहीं गये, वह आज एक वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर हैं, प्रकृति पर एक पत्रिका(www.care4nature.org) भी निकालते है ! अहमदाबाद से ही आई सुमि ने अपने दोनो बच्चों कुदरत और अजन्मया को कभी स्कूल नहीं भेजा और ना ही कभी कोई दवाई या टीका लगवाया ! उड़ीसा से आए श्याम और बिंदिया ने पिछले एक साल से अपने बच्चो को स्कूल भेजना छोड़ दिया ! श्याम ने, जो खुद आई.आई.एम. और आई.आई.टी. से पढ़े हुए है, अपने बच्चो को स्कूल के बंधन से मुक्त किया और उन्हे वापस सृजनात्मकता पाने का मौका दिया !

उदयपुर से आए २३ वर्षीय मनोज और २२ वर्षीय विकी ने भी स्कूली शिक्षा के बंधनों को तोड़ा और खुद की केटरिंग शुरू की, जिसका नाम उन्होने 'जसो अन्न, वसो मन' रखा ! यहाँ उन्होने बिना तेल इस्तेमाल किए व क्षेत्रीय अन्न जैसे बाजरा, आदि द्वारा भोजन बनाया ! उदयपुर से आए १७ वर्षीय रोहित ने नारियल के टुकड़ो और छिल्को का प्रयोग कर उन से शिल्प-वस्तुएँ बनाई ! उसी प्रकार दिल्ली से आए रजत और अहमदाबाद से आए रवि और ख्याति भी अपने बच्चो को स्कूल नही भेजते ! अंजड़ से आए मुकेश जाट की ५ वर्षीय बच्ची उन्हे खेती-बाड़ी व वार्मी-कंपोस्ट बनाने में मदद करती हैं ! छतरपुर से आए संजय और दमियन्ती ने स्व-उपचार पर अपने प्रयोगों के बारे में जानकारी दी ! इन सब लोगों ने यह निर्णय इसलिए लिया क्योंकि इन्हें लगा कि शिक्षा बंद कमरों में नहीं, शिक्षक या किताबो में नहीं, परंतु शिक्षा वह है जो कि बच्चे या बड़े मन से सीखें ! आज की स्कूली शिक्षा हमें बने-बनाए ढाँचों में फिट करना चाहती है, जिससे हमारी रचनात्मकता को ठेस पहुचती है और हम अपने आप को समझ ही नहीं पाते ! इन परिवारों ने अपने पहनावे और ख़ान-पान में भी काफ़ी बदलाव किए ! सम्मेलन में सबने अपने भोजन पर भी प्रयोग किए ! इस सम्मेलन में कुछ और अनोखे प्रयोग किए गये जैसे कि साइकल से मिक्सर चलाया, जिससे ये सीखा हमने की बिजली की ज़रूरत को इंवार्टर लगाने के बजाय अपने शरीर की उर्जा का इस्तेमाल कर सकते है ! इंदौर शहर से कई परिवार आए जिन्होने इन प्रयोगों को समझा और आपसी विचारों का आदान—प्रदान किया!

- मिट्टी टीम

20.1.10

मेरे प्रयोग


जीवन के साथ प्रयोग करके सीखने का मज़ा कुछ और ही है ! यह प्रयोग कर मैने अपने अंदर मौजूद कुछ मिथको को चुनौती दी और उन्हे तोड़ने में भी सफल रहा ! पहला मिथक था साबून, परफ्यूम, पावडर, टूतपेस्ट आदि तो जीवन के आवश्यक तत्व है ! बचपन से ही इन सब उत्पादों का प्रयोग करने से यह सवाल कभी मंन में नहीं आया की आख़िर क्यों? पर जब २० साल की ओपचारिक शिक्षा के बंधन से छूटने के बाद जब खुद को जानने का समय मिला, तो पाया की साबून, टूतपेस्ट, प्रफ्यूम आदि की आवश्यकता तो मनुष्य को है ही नहीं ! 

सबसे पहले मैने टूतपेस्ट का इस्तेमाल बंद किया, और उसका वैकल्पिक अपनाया !  कभी नीम की डंडी से तो कभी नमक और सरसो का तेल मिलाकर दातुन किया ! इससे एक बहुत बड़ी बात सामने आई, और वह यह कि सुबह सिर्फ़ एक बार इनका प्रयोग करने से दिन में दूसरी बार दाँत सॉफ करने की कोई आवश्यकता नहीं है, जो की विज्ञापनों में ढिंढौरा पीटकर कहा जाता है ! वैसे दाँतों की पेस्ट के विज्ञापन में यह सिर्फ़ इसलिए कहा जाता है ताकि उनके उत्पाद की बिक्री जल्द से जल्द हो, दाँत साफ करवाना तो सिर्फ़ एक बहाना है ! टूतपेस्ट के उपयोग से शाम तक दांतो पर एक परत बन जाती है जिससे हमे लगता है की दाँतों को साफ करना ही बेहतर होगा, परंतु नीम या सरसो के तेल का उपयोग करने से यह परत नहीं बनेगी ! साबुन की आवश्यकता के उत्तर में सिर्फ़ यही तर्क दिया जा सकता है कि साबून शरीर के मैल को धोने के लिए ज़रूरी है ! यह तर्क दे कर हम अपने शरीर में मौजूद ऐसी ग्रंथियों को नकार देते हैं, जो साबून का काम करती हैं ! जब हम कुछ काम करते हैं तो शरीर से पसीना निकलता है, और यही पसीना हमारे शरीर के मैल को भी बहा ले जाता है ! तो फिर क्या ज़रूरत है साबून की? परफ्यूम और डेयाड्रांट लगाकर निकलना तो शान माना जाता है !  पर परफ्यूम से श्वास में तकलीफ़ और डेयाड्रांट से पसीने की ग्रंथियाँ बंद हो जाती है, जिससे शरीर के अंदर का तापमान बढ़ जाता है जो की शरीर के लिए हानिकारक है ! यह थे मेरे कुछ प्रयोग, अगर आप भी कुछ प्रयोग कर रहे है अपने जीवन में, तो हमारे साथ बाँटिए ! 


- राहुल हासिजा