आज बचपन सिर्फ़ चार दीवारी में क़ैद हो कर रह गया है ! स्कूल में कक्षा के अंदर और घर में टी.वी. के सामने बिठाकर हम बच्चो को पूरी दुनिया समझने की चेष्टा करते हैं इस बात से बेख़बर कि दुनिया टी.वी. और क्लासरूम में नहीं, इसके बाहर है ! क्या हमनें सोचा है कि बचपन की सिर्फ़ एक ही भूख होती है, सिर्फ़ खेलना और खेलना ! फिर क्यों हम अपने बच्चे को दो से तीन वर्ष की उम्र से ही स्कूल में डाल देते हैं बिना अपने आप से यह सवाल करे कि अपने बच्चे को स्कूल भेजे तो आख़िर क्यों ! हर बच्चे में सीखने की एक जन्मजात प्रवर्त्ती होती है ! बच्चे अपने आसपास के वातावरण से बखूबी सीखते है ! हम ज़बरदस्ती यह मिथक पाल लेते है कि सिर्फ़ किताबों से कोई सीख लेता है ! शिक्षा किताबों के पन्नो में नहीं, ना ही शिक्षा चारो तरफ से बंद कक्षा में ग्रहण की जा सकती है ! अगर माता पिता चाहे तो अपने बच्चो को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्मुक्त गगन का उपहार दे सकते है ! कहा जाता है की पढाई के समय पढाई और खेल के समय खेल होना चाहिए पर यह विचार ही ग़लत है ! अगर पढाई भी खेल के स्वरूप में हो तो इस खेल को खेलने के लिए बच्चो का उत्साह देखने योग्य होगा ! हमें आज शिक्षा पर फिर से एक नयी बहस करने की ज़रूरत है ! आप आमंत्रित है अपने विचार प्रकट करने के लिए !
- दिनेश कोठारी
14.12.09
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