मिट्टी - एक पहल

इस सृष्टि में रहने वाले हर प्राणी का ताना-बना बुनने वाली जो चीज़ है, वह है 'मिट्टी' ! हमारा अस्तित्व है, क्योंकि इस मिट्टी ने हमारी जड़ो को मजबूती से पकड़ रखा है ! जीवन की अंधी दौड़ में हम उन जड़ो से दूर भागने की कोशिश कर रहे है और द्वेष , ईर्ष्या, लालच, भय की दीवारें खड़ी कर रहे हैं ! पर हमारा निर्माण ही उस मिट्टी से हुआ है, और एक दिन उसी मिट्टी में दफ़न होना है तो फिर जड़ों से दूर भागना कहाँ लाज़मी है ! जिस प्रकार फूलों को अगर जड़ो से उखाड़ दिया जाए तो वह मुरझा जाते हैं, व अधमरे से हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपनी जड़ों से दूर बिल्कुल भी नही रह सकते ! क्या हमने गौर किया है कि जिस भय, पैसे, लोभ, और ईर्ष्या रूपी दीवारों की दुनिया में हम अपना जीवन व्याप्त कर रहे हैं, वह सुकून भरी है या नहीं ! जब हम इस बात पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि हमें ना तो सुकून मिल पाता है ना ही खुशी ! हम इन चार दीवारों में ही इतने व्यस्त हैं कि उसके पार मौजूद खुशियों को महसूस तक नहीं कर पाते ! हमारा समुदाय समाप्ति की कगार पर है, आपसी संवाद ख़त्म हो चुका है और खुशियाँ तितर-बितर हो चुकी हैं ! ऐसे समाज में हम खुद जी रहे हैं और ऐसे ही समाज को हम अपनी आने वाली पीढी को तोहफे के रूप में देने वाले हैं !

हमारा पत्र 'मिट्टी' एक आमंत्रण हैं आप सबको के आए और चले अपनी जड़ो की ओर और महसूस करे अपने जीवन की महक को, जो कहीं खो सी गयी हैं ! यह पहल है एक ऐसा समुदाय स्थापित करने की, जो एक दूसरे को समझे, प्यार मुहब्बत से रहे, न कि अपने बीच दीवारें खड़ी कर दे ! यह पत्र आपका है, व आपके सहयोग से चलाया जाएगा ! अगर आप अपने अनुभव हमारे साथ बाटना चाहते है, किसी भी विषय पर, हमे लिख के भेजिए ! अगर आप लिखकर नही, परंतु बताकर कुछ कहना चाहते है, हमसे संपर्क कीजिए, हम आकर आपकी बाते सब तक पहुचायँगे ! कुछ खाने की विधि हो, या घरेलू नुस्खे, कबाड़ का प्रयोग कर कुछ बनाई जाने वाली चीज़ो का विवरण, या आपके जीवन के अनुभव, हम हमेशा तत्पर रहेंगे आपके विचारो को लोगो तक पहुचाने के लिए ! यह पत्र साप्ताहिक या मासिक प्रकाशित नही होगा, परंतु जब भी आपके सहयोग से लिखने वाली सामग्री उपलब्ध हो जाएगी, तभी प्रकाशित हो जाएगी ! इस पत्र में कोई advertisement नहीं होगी ! हमारा यही प्रयास रहेगा कि आपसी सहयोग से हम इस पत्र का प्रकाशन करें ! अगर आप इस प्रयास में अपना योगदान देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है !

- राहुल हासिजा
संपादक
मिट्टी

14.12.09

क़ैद होता बचपन

आज बचपन सिर्फ़ चार दीवारी में क़ैद हो कर रह गया है ! स्कूल में कक्षा के अंदर और घर में टी.वी. के सामने बिठाकर हम बच्चो को पूरी दुनिया समझने की चेष्टा करते हैं इस बात से बेख़बर कि दुनिया टी.वी. और क्लासरूम में नहीं, इसके बाहर है ! क्या हमनें सोचा है कि बचपन की सिर्फ़ एक ही भूख होती है, सिर्फ़ खेलना और खेलना ! फिर क्यों हम अपने बच्चे को दो से तीन वर्ष की उम्र से ही स्कूल में डाल देते हैं बिना अपने आप से यह सवाल करे कि अपने बच्चे को स्कूल भेजे तो आख़िर क्यों ! हर बच्चे में सीखने की एक जन्मजात प्रवर्त्ती होती है ! बच्चे अपने आसपास के वातावरण से बखूबी सीखते है ! हम ज़बरदस्ती यह मिथक पाल लेते है कि सिर्फ़ किताबों से कोई सीख लेता है ! शिक्षा किताबों के पन्नो में नहीं, ना ही शिक्षा चारो तरफ से बंद कक्षा में ग्रहण की जा सकती है ! अगर माता पिता चाहे तो अपने बच्चो को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्मुक्त गगन का उपहार दे सकते है ! कहा जाता है की पढाई के समय पढाई  और खेल के समय खेल होना चाहिए पर यह विचार ही ग़लत है ! अगर पढाई भी खेल के स्वरूप में हो तो इस खेल को खेलने के लिए बच्चो का उत्साह देखने योग्य होगा ! हमें आज शिक्षा पर फिर से एक नयी बहस करने की ज़रूरत है ! आप आमंत्रित है अपने विचार प्रकट करने के लिए ! 

- दिनेश कोठारी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें