प्रकृति अपनी नियमिताओं को तोड़ कर अनियमित व्यवहार कर रही है जो कि मनुष्य की ही नितक्रिया का एक बड़ा स्वरूप है ! मनुष्य जाति की शुरुआत में झाँके तो देख सकते हैं कि प्रकृति ने मनुष्य को अपनी गोद में पनाह दी और उर्जा प्राप्त करने के लिए भोजन की व्यवस्था भी की ! पर मानव ने कभी संतुष्ट होना नहीं सीखा ! उसने मूलभूत आवश्यकताओं की सीमा को बड़ा कर उसमे कपड़ा और मकान को भी शामिल किया! इन ज़रूरतों के लिए मानव ने पृथ्वी के अंगो का इस्तेमाल किया और अपनी इन तीनों आवश्यकताओं को उनकी चरम सीमा तक हासिल कर लिया ! पर अब भी मनुष्य संतुष्ट नहीं हुआ है, वह प्रकृति से और भी बहुत कुछ लेना चाहता है ! उसने आवश्यकतों की सीमा को और बड़ा कर उसमे टी.वी. और सिनेमा द्वारा मनोरंजन, फ्रिज, ए.सी., स्कूली शिक्षा, अच्छी नौकरी आदि को भी शामिल कर लिया है ! आख़िर कब तक प्रकृति मनुष्य के हनन को स्वीकार करेगी ? क्या मनुष्य प्रकृति और अपने रिश्ते को समझ कर प्रकृति की असीम ताक़त का कद्रदान हो पाएगा...? आख़िर कब सोचेगा मनुष्य ?
- अंबर शर्मा
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