क्या आप किसी चोर, बलात्कारी या अशलीलता को किसी भी रूप में अपने घर में प्रवेश करने देंगे? क्या आप चाहेंगे की कोई अशलील फोटोग्राफ आपके ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाए? अगर आप नहीं, पर टी.वी. में सेंध लगाए बैठी बड़ी-बड़ी कंपनिया निर्णय ले कि आप क्या भोजन करें, क्या देखे, क्या पहने, क्या सुने, तो आपको कैसा लगेगा? आपको लगता हैं कि टी.वी. से पूरे संसार की जानकारी मुफ़्त में मिल जाती है, लेकिन क्या आपको पता है कि इसकी आपको बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है ! टी.वी के ज़रिए आप पर उपभोक्तावाद लादा जाता है ! आपके दिमाग़ पर ऐसी चीज़ों के प्रति मोह उत्पन्न किया जाता है, जो कभी भी आपकी ज़रूरत नही रही होगी ! किसी को टी.वी. की बुराई सुनाए तो कहते हैं कि "हम तो डिस्कवरी और वाइल्ड लाइफ वाले चॅनेल देखते है"! पर सच यह हैं कि यह चॅनेल भी दूसरो के अनुभवों को हम तक पहुचाते है, पर हम खुद अनुभव करने से वंचित रह जाते है !
लेकिन अगर आप टी.वी. बंद कर देते हैं, तो आपका एक प्रश्न होगा कि टी.वी. नही तो क्या करे? समय कैसे व्यतीत करें? आप एक बार टी.वी. बंद करके तो देखें, घर की रौनक लौट आएगी ! मिल बैठकर गपशप कीजिए, घर में खाने का कुछ मिलकर बनाएँ, परिवार के साथ संगीत की सभा का आयोजन करें हर रात को और देखिए कैसे आपके घर का माहौल खुशियों से खिल उठता है ! तो फिर देर किस बात की, आइए आज से ही इसकी शुरुआत करें ! मन् में कुछ विचार या शंका हो तो 'मिट्टी' की टीम से चर्चा कर सकते हैं और 'टी.वी. नहीं, तो क्या?’ विषय पर पर एक कार्यशाला का भी आयोजन कर सकते हैं !
- दिनेश कोठारी
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