मिट्टी - एक पहल

इस सृष्टि में रहने वाले हर प्राणी का ताना-बना बुनने वाली जो चीज़ है, वह है 'मिट्टी' ! हमारा अस्तित्व है, क्योंकि इस मिट्टी ने हमारी जड़ो को मजबूती से पकड़ रखा है ! जीवन की अंधी दौड़ में हम उन जड़ो से दूर भागने की कोशिश कर रहे है और द्वेष , ईर्ष्या, लालच, भय की दीवारें खड़ी कर रहे हैं ! पर हमारा निर्माण ही उस मिट्टी से हुआ है, और एक दिन उसी मिट्टी में दफ़न होना है तो फिर जड़ों से दूर भागना कहाँ लाज़मी है ! जिस प्रकार फूलों को अगर जड़ो से उखाड़ दिया जाए तो वह मुरझा जाते हैं, व अधमरे से हो जाते हैं, उसी प्रकार हम अपनी जड़ों से दूर बिल्कुल भी नही रह सकते ! क्या हमने गौर किया है कि जिस भय, पैसे, लोभ, और ईर्ष्या रूपी दीवारों की दुनिया में हम अपना जीवन व्याप्त कर रहे हैं, वह सुकून भरी है या नहीं ! जब हम इस बात पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि हमें ना तो सुकून मिल पाता है ना ही खुशी ! हम इन चार दीवारों में ही इतने व्यस्त हैं कि उसके पार मौजूद खुशियों को महसूस तक नहीं कर पाते ! हमारा समुदाय समाप्ति की कगार पर है, आपसी संवाद ख़त्म हो चुका है और खुशियाँ तितर-बितर हो चुकी हैं ! ऐसे समाज में हम खुद जी रहे हैं और ऐसे ही समाज को हम अपनी आने वाली पीढी को तोहफे के रूप में देने वाले हैं !

हमारा पत्र 'मिट्टी' एक आमंत्रण हैं आप सबको के आए और चले अपनी जड़ो की ओर और महसूस करे अपने जीवन की महक को, जो कहीं खो सी गयी हैं ! यह पहल है एक ऐसा समुदाय स्थापित करने की, जो एक दूसरे को समझे, प्यार मुहब्बत से रहे, न कि अपने बीच दीवारें खड़ी कर दे ! यह पत्र आपका है, व आपके सहयोग से चलाया जाएगा ! अगर आप अपने अनुभव हमारे साथ बाटना चाहते है, किसी भी विषय पर, हमे लिख के भेजिए ! अगर आप लिखकर नही, परंतु बताकर कुछ कहना चाहते है, हमसे संपर्क कीजिए, हम आकर आपकी बाते सब तक पहुचायँगे ! कुछ खाने की विधि हो, या घरेलू नुस्खे, कबाड़ का प्रयोग कर कुछ बनाई जाने वाली चीज़ो का विवरण, या आपके जीवन के अनुभव, हम हमेशा तत्पर रहेंगे आपके विचारो को लोगो तक पहुचाने के लिए ! यह पत्र साप्ताहिक या मासिक प्रकाशित नही होगा, परंतु जब भी आपके सहयोग से लिखने वाली सामग्री उपलब्ध हो जाएगी, तभी प्रकाशित हो जाएगी ! इस पत्र में कोई advertisement नहीं होगी ! हमारा यही प्रयास रहेगा कि आपसी सहयोग से हम इस पत्र का प्रकाशन करें ! अगर आप इस प्रयास में अपना योगदान देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है !

- राहुल हासिजा
संपादक
मिट्टी

19.12.09

कंपनी राज






ह चित्र बनाया तो दो बच्चो ने है, पर इसमें छुपा सच बड़ों-बड़ों को हिला कर रख दे ! कंपनियों से मिलते बल से सरकार आम जनता को उखाड़ने पर आतुर है ! जो आज़ादी से पहले East India Company   ने किया, वही आज की कंपनियाँ कर रही है, फ़र्क सिर्फ़ इतना कि   आज हमारा जीवन इन कंपनियों के उत्पादों के इर्द गिर्द घूमता है और हम तन-मन से उन्हे लगा कर बैठे है ! मुझे विदेशी उत्पाद या फिर विदेशी कंपनियों से कोई बैर नहीं, परंतु जब उनकी वजह से मेरे देश के लोग बेघर हो जाएँ तो यह निंदनीय हैं ! वो कोक-पेप्सी हो, मानसंटो हो या फिर हमारे देश की बड़ी कंपनियाँ जैसे रिलाइयन्स, टाटा आदि ! अगर हम टाटा नेनो खरीदते है तो हम अपने हाथ उस खून से रंग देंगे जो सिंगूर(कलकत्ता) में मारे गये लोगों का है जो टाटा नेनो के उत्पादन कारखाने के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे थे ! उनकी बेशक़ीमती ज़मीन को ज़बरदस्ती छीन कर हमारे लिए सस्ते सपने बनाए जा रहे थे ! आदिवासियों की ज़मीनों पर क़ब्ज़ा कर यह कंपनियाँ अपनी तिजोरियाँ भर लेती हैं ! पेप्सी-कोक तो हम गप-गप करके पी जाते हैं, पर यह नहीं सोच पाते कि हर दिन इनके उत्पादन कारखानें १५०-२०० करोड़ लीटर शुद्ध पीने का पानी गटक जाते हैं ! हमारे ही पानी में रसायन मिला कर हमें ही बेच दिया जाता है और हम इसे style statement बताकर खुद अपना ही शोषण कर जाते है ! ज़रूरत है कि हम इन कंपनियों का बहिष्कार करें और वैकल्पिक उत्पादों का प्रयोग करें !        

चित्र        -सुष्मित दावानी और हृत्विक दावानी       
लेख    - राहुल हासिजा       

          

14.12.09

क़ैद होता बचपन

आज बचपन सिर्फ़ चार दीवारी में क़ैद हो कर रह गया है ! स्कूल में कक्षा के अंदर और घर में टी.वी. के सामने बिठाकर हम बच्चो को पूरी दुनिया समझने की चेष्टा करते हैं इस बात से बेख़बर कि दुनिया टी.वी. और क्लासरूम में नहीं, इसके बाहर है ! क्या हमनें सोचा है कि बचपन की सिर्फ़ एक ही भूख होती है, सिर्फ़ खेलना और खेलना ! फिर क्यों हम अपने बच्चे को दो से तीन वर्ष की उम्र से ही स्कूल में डाल देते हैं बिना अपने आप से यह सवाल करे कि अपने बच्चे को स्कूल भेजे तो आख़िर क्यों ! हर बच्चे में सीखने की एक जन्मजात प्रवर्त्ती होती है ! बच्चे अपने आसपास के वातावरण से बखूबी सीखते है ! हम ज़बरदस्ती यह मिथक पाल लेते है कि सिर्फ़ किताबों से कोई सीख लेता है ! शिक्षा किताबों के पन्नो में नहीं, ना ही शिक्षा चारो तरफ से बंद कक्षा में ग्रहण की जा सकती है ! अगर माता पिता चाहे तो अपने बच्चो को शिक्षा ग्रहण करने के लिए उन्मुक्त गगन का उपहार दे सकते है ! कहा जाता है की पढाई के समय पढाई  और खेल के समय खेल होना चाहिए पर यह विचार ही ग़लत है ! अगर पढाई भी खेल के स्वरूप में हो तो इस खेल को खेलने के लिए बच्चो का उत्साह देखने योग्य होगा ! हमें आज शिक्षा पर फिर से एक नयी बहस करने की ज़रूरत है ! आप आमंत्रित है अपने विचार प्रकट करने के लिए ! 

- दिनेश कोठारी

कब सोचेगा मनुष्य?


प्रकृति अपनी नियमिताओं को तोड़ कर अनियमित व्यवहार कर रही है जो कि मनुष्य की ही नितक्रिया का एक बड़ा स्वरूप है ! मनुष्य जाति की शुरुआत में झाँके तो देख सकते हैं कि प्रकृति ने मनुष्य को अपनी गोद में पनाह दी और उर्जा प्राप्त करने के लिए भोजन की व्यवस्था भी की ! पर मानव ने कभी संतुष्ट होना नहीं सीखा ! उसने मूलभूत आवश्यकताओं की सीमा को बड़ा कर उसमे कपड़ा और मकान को भी शामिल किया! इन ज़रूरतों के लिए मानव ने पृथ्वी के अंगो का इस्तेमाल किया और अपनी इन तीनों आवश्यकताओं को उनकी चरम सीमा तक हासिल कर लिया ! पर अब भी मनुष्य संतुष्ट नहीं हुआ है, वह प्रकृति से और भी बहुत कुछ लेना चाहता है ! उसने आवश्यकतों की सीमा को और बड़ा कर उसमे टी.वी. और सिनेमा द्वारा मनोरंजन, फ्रिज, ए.सी., स्कूली शिक्षा, अच्छी नौकरी आदि को भी शामिल कर लिया है ! आख़िर कब तक प्रकृति मनुष्य के हनन को स्वीकार करेगी ? क्या मनुष्य प्रकृति और अपने रिश्ते को समझ कर प्रकृति की असीम ताक़त का कद्रदान हो पाएगा...? आख़िर कब सोचेगा मनुष्य ?


 - अंबर शर्मा

 

मिट्टी के खिलौने


यूँ तो बाजार में बने बनाए खिलौने धड़ल्ले से बिकते है, पर मिट्टी से बने खिलौने का कुछ अलग ही मज़ा है ! अगर मिट्टी हमारे सामने रख दी जाए तो हम उसे किसी भी रंग-रूप में ढाल सकते हैं ! मिट्टी से इंसान, जानवर और कोई सी भी अदभुत आकृति का निर्माण कर सकते हैं ! बाजार में बिकते प्लास्टिक के खिलौने रसायन से भरपूर होते हैं और उन्हे बच्चो को तोहफे में दे दिया जाता है ! इन बने-बनाए खिलौनों को तोहफे में देने के बजाय थोड़ी सी गीली मिट्टी दे देनी चाहिए क्योंकि बच्चे मिट्टी को अपनी इच्छानुसार आकार दे सकते हैं जो उनकी रचनात्मक और सृजनात्मक शैली को निखार देती है ! और खुद बनाई गयी कोई भी चीज़ से जो खुशी का आभास होता है वो किसी बनी-बनाई चीज़ से नहीं होता ! तो आप कब मिट्टी के खिलौने बना रहे है ?
- राहुल हासिजा       


बाहुबली प्रकृति

प्रकृति में कुछ भी ऐसा नहीं है जो यह सिद्ध करता हो कि वह किसी अन्य प्रजाति के मुकाबले मानव को ज़्यादा महत्व देती हो! एक दिन हम भी ऐसे ही उतनी ही आसानी से जड़ से विलुप्त हो सकते है, जैसे हमारे सामने कई हजारों प्रजातियाँ....! प्रकृति माँ का कोई लाड़ला नहीं है ! प्राकृतिक संतुलन जब भी ख़तरे में होता है तो प्रकृति उस संतुलन को बरकरार रखने के लिए कोई ना कोई रास्ता ढूँढ ही लेती है, चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो !






यदि प्रकृति हमारे कारण संकट में आती है तो वह स्वयं को पुनः सज-संवार लेगी और वह किसी मनुष्य और एक छोटे से पुष्प में भेद नहीं करेगी ! यहाँ पर एक ऐसी अद्रुश्य और प्रबल शक्ति की बात कर रहे हैं, जो कि स्वयं जीवन है और हम सिर्फ़ यह जानते हैं कि विभिन्न प्रजातियों में प्रकृति का कोई एक अतिप्रिय नहीं हैं ! 

- "वॅनिशिंग स्पेसीज" रोमेन ग्रे से

थाली में ज़हर


अगर आपको पता है कि आप जो बैंगन खा रहे हैं, उसमे सुअर का जीन और टमाटर में मछली का जीन है तो क्या आप उसे खाते ? पर अब यह सब्ज़ियाँ आपकी थाली में परोसी जाएँगी क्योंकि जेनेटिक इंजिनियरिंग अप्रूवल समिति ने देश में ऐसी बैंगन की फसल को इजाज़त दे दी है और सिर्फ़ सरकारी ठप्पा लगना बाकी है ! यह समिति व सरकार उन बड़ी कंपनियों की कट्पुतली बन चुकी है जो हमे ऐसी चीज़े परोसने के लिए राज़ी हो गये है और हमारी नैतिकता व स्वास्थ्य को दाँव पर लगा दिया है ! जीनांतरित सब्ज़ियों में जानवरों और कीड़े-मकोड़ो के जीन डाले जाएँगे जिससे हमारे दिल, दिमाग़, गुर्दे, और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को नुकसान पहुचेगा और हममें एलर्जी की संभावना अति त्रीव हो जाएगी ! आप प्रयोगशाला के चूहे नहीं है जिस पर ऐसे प्रयोग कर बड़ी कंपनियों की तिजोरी भरी जाए ! अगर आप जीनांतरित फसलों के बारे में विस्तार से जानना चाहते है तो मिट्टी टीम से संपर्क करें ! आपके आग्रह पर हम 'थाली में जहर' डॉक्युमेंटरी का प्रसारण आपके मोहल्ले या घर में सकते है ! आप इस डॉक्युमेंटरी की प्रति भी हम से ले सकते हैं !                                       
- दिनेश कोठारी                         


खरीदने से पहले


क्या आज आप कुछ खरीदने की सोच रहे हैं? रुकिये और दस मिनट सोचिए कि :
१. क्या खरीदारी करना ज़रूरी है या उसके बिना ही आप काम चल सकता है ! 
२. गैर ज़रूरी सामान खरीदने के लिए आपके घर के कमाउ सदस्य को अतिरिक्त कार्य करना पड़ेगा! 
३. जो आप खरीदने जा रहे है, वो वस्तु आप स्वयं भी अपने परिवार एवं दोस्तों की मदद से बना सकते है ! अगर आप खुद के कपड़े बनाते है तो आप उसे पहन कर जल्दी बोर नहीं होंगे एवं उसमे आपकी सृजनात्मकता की झलक दिखेगी ! सिर्फ़ कपड़े ही नही, ऐसी अनेकों चीज़े हैं जो आप स्वयम् बना सकते है जैसे साबुन, सजावटी वस्तुएँ, पर्दे, आदि वो भी कम से कम मूल्य पर ! 

४. अगर फिर भी आप ज़रूरत के हिसाब से खरीद रहे है तो हमेशा कोशिश करें की वस्तु अपने घर के आसपास वाली दुकान से लीजिए न की बड़ी दुकानो से क्योंकि जब आप घर के पास से खरीदते है, आप स्वरोजगार को सहारा देते है !  

- दिनेश कोठारी                         


विज्ञापन की आग में झुलसते हम

टी.वी. का अधिकांश समय विज्ञापनों की भेंट चड़ा होता है, वहीं अख़बारों के पन्नों में ख़बरे कम विज्ञापन ज़्यादा होते हैं ! विज्ञापन हममें यह अहसास पैदा करते है कि जो हमारे पास है वह आज के हिसाब से ठीक नहीं ! दिन में ३००० बार हमें यह बताया जाता है कि हमारे बाल ठीक नहीं, हमारी खाल ठीक नहीं, हमारी कार ठीक नहीं, हमारा खाना ठीक नहीं, हमारी वेश-भूषा ठीक नहीं, हम ठीक नहीं ! अगर हम श्यामवर्ग (साँवले रूपरंग) के हैं तो हममें अपने रंग के प्रति तिरस्कार पैदा किया जाता है और यह बताया जाता हैं कि सिर्फ़ गोरे लोग ही इस दुनिया में तरक्की कर सकते है ताकि उनका गोरेपन का उत्पाद हमें बेच सकें ! ज़्यादातर विज्ञापन बच्चो को निशाना बनाकर बनाए जाते हैं जो बच्चो के हृदय में लालच के बीज बोते हैं क्योंकि बच्चे जब उस चीज़ को खरीदने की ज़िद्द करते है, तो पालकों को विवश हो कर वह लेनी ही पड़ती है ! हममें यह भ्रम पैदा किया जाता है कि दूध में Bournvita और Complan के उनके उत्पाद का पावडर डालने से बच्चो का विकास जल्दी होता है जो कि सरासर झूठ है ! पहले ज़माने में क्या लोगों का विकास नहीं होता था? इन उत्पादो के साथ मुफ़्त ऐसी चीज़े दी जाती हैं जो बच्चो को आकर्षित करती है जैसे कि खिलोने, स्टिकर, आदि ! एक विज्ञापन बनाने वाले ने कहा कि "जब बच्चे को कुछ उत्पाद बेचा जाता है और उसे नहीं मिलता है, तो वह खुद को ज़मीन पर फेंक देता है, रोता है, ऐसी प्रतिक्रिया किसी वयस्क से नही मिल सकती" ! इसका अर्थ सिर्फ़ यही है कि विज्ञापन बच्चो पर केंद्रित किए जाते हैं ! नहीं तो क्या कारण है जो बच्चो का इस्तेमाल Insurance और तकनीकी उत्पादो आदि के विज्ञापनों में किया जाता है ? बच्चो को विज्ञापन की आग में झोंक देना ही विज्ञापन वालों का मकसद है !
अगर गौर किया जाए तो लगभग हर टी.वी., फ्रिज, और अन्य घरेलू उत्पादों के विज्ञापन में सिर्फ़ एकल परिवार को उपयोग करते हुए खुश दर्शाया जाता है ! संयुक्त परिवार इन विज्ञापनों से गुम होते हैं ! इसका अर्थ यह है कि कंपनियाँ यही चाहती है कि हमारा घर टूटे क्योंकि जबतक एक संयुक्त परिवार है, उस घर में सिर्फ़ एक टी.वी., एक किचन, और सब एक ही सामान की आवश्यकता है, पर जब इस परिवार के टुकड़े होते हैं तो टुकड़ो के हिसाब से उत्पादो की माँग में वृद्धि हो जाती है ! कंपनियों का फ़ायदा हमारे परिवार टूटने में ही है ! जब ओनिडा टी.वी. को भारत के बाजार में उतरा गया तो उसका नारा था ‘NEIGHBOURS ENVY OWNERS PRIDE’ यानी ‘उपभोक्ता का गर्व उनके पड़ोसी की जलन’ ! पड़ोसियों के बीच में एक दूसरे के प्रति द्वेष और जलन का माहौल पैदा करना इस विज्ञापन का मुख्य उद्देश्य था ! 'शर्तें लागू' लिख कर उत्पाद की आधी बातें छुपा दी जाती हैं ! ज़रूरत है इस विज्ञापन की आग की लपटों से समाज को बचाने की ! हमें प्रलोभनों के बहकावे में ना आकर उत्पादों के कम से कम प्रयोग ही करना चाहिए ! आप आमंत्रित हैं हमसे अपने अनुभव या सुझाव बाँटने के लिए ! अगर आप विज्ञापन जगत की कड़वी सच्चाई जानना चाहते है तो www.adbusters.org पर देख और समझ सकते हैं !

- राहुल हासिजा

यह बच्चा DULL है...

मेरा बच्चा तो पड़ाई में अच्छे अंक लाता है, आपके बच्चे को क्या तकलीफ़ हैं?", "आपका बच्चा तो क्लास में कुछ बोलता ही नही हैं, भोन्धु है बिल्कुल" ! अच्छे अंक ना लाने पर माँ-बाप व शिक्षक यह मान लेते हैं की उनका बच्चा dull हैं और बाकी बच्चो के सामने थोड़ा कमज़ोर हैं ! मेरा सवाल हैं उन माँ-बाप और शिक्षको से की वो कौन होते हैं किसी बच्चे को dull मानने वाले? सिर्फ़ अंको को मापदंड मानकर बच्चो पर यह मोहर लगा दी जाए की वे भोन्धु है, यह कहाँ का इंसाफ़ हैं? जब माँ-बाप ही उन्हे कटघरे में खड़े कर देते हैं. तो फिर दुनिया तो उन्हे मुज़रिम ही समझेगी ! हर बच्चा अलग पहचान- अलग खूबी लेकर पैदा होता है ! कोई खेल में, कोई कलाकृति बनाने में, कोई पड़ने में तो कोई नृत्य में अच्छा होता है, पर फिर भी स्कूली शिक्षा को ही क्यों किसी को जानने का पैमाना बनाया जाता है?
क्या आप भी अपने बच्चो को उनके अंको के अनुरूप उन्हे dull या समझदार मानते है? क्या आपका बच्चा भी अंको के खेल में पीछे है? तो आप आमंत्रित है इस विषय पर अपने विचार प्रकट करने के लिए ! 





जब शिक्षा प्राप्ति के इतने स्त्रोत उपलब्ध हैं, तो क्या एक ही स्त्रोत को शिक्षा मान लेना उचित है ??? ज़रूरत है कि हम अन्य स्त्रोतों का भी महत्व समझे एवं बच्चो को उन्हे अपनी इच्छा अनुसार स्त्रोत का चयन करने दे !


टूटी रीढ़ की हड्डी


१८३५ में लॉर्ड मकालाया द्वारा ब्रिटिश संसद में कही गयी बात : मैं भारत के हर कोने में घुमा और यह महसूस किया कि भारत में ना कोई भिखारी है, ना ही कोई चोर ! अपार धन संपाति, उचे मूल्यों व आचारो वाले लोग रहते है ! हम जब तक इस देश की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संपति रूपी रीढ़ की हड्डी को तोड़ नही देते, तब तक हम इस देश पर फ़तेह नही कर सकते इसलिए मैं उनकी पुरानी व प्राचीन शिक्षा प्रणाली को बदलने का प्रस्ताव रखता हूँ क्योंकि अगर भारतवासी यह सोचते है कि विदेशी चीज़ और अँग्रेज़ी भाषा उनकी भाषा और संस्कृति से उच्च है, तो वह अपनी मूल संस्कृति खो देंगे और वे वही बन जाएँगे जो हम चाहते है ! हम उन्हे अपने अधीन शासित करेंगे !"

वो दिन था और आज का दिन है, लॉर्ड मकलॉय की कही हुई बात सच होती दिख रही है ! हमारी मजबूत संस्कृति अब खंडित हो चुकी है ! हमें विदेशी चीज़ो के प्रति अलग ही लगाव होता है, वहीं हम देशी वस्तुओं को निम्न नज़रो से देखते है ! देशी चीज़ अगर लाख गुना अच्छी भी होगी तो भी हम विदेशी को तरहीज देंगे ! संस्कृत व हिन्दी के विषय की पढ़ाई के प्रति हमारी नकारत्मकता और अँग्रेज़ी के प्रति झुकाव मकलॉय की बात को सच साबित करता है ! हर माता - पिता चाहते है की उनका बच्चा अँग्रेज़ी में अव्वल हो क्योंकि अँग्रेज़ी आने से वह बच्चा बड़ा हो कर किसी बड़ी कंपनी को बड़े दामों में बिक जाएगा ! अँग्रेज़ी आना ग़लत नही है, पर अपनी राष्ट्र भाषा या मातृ भाषा का तिरस्कार करना कहाँ उचित है ? ज़रूरत है कि हम अपनी भाषा व संस्कृति को उसका खोया हुआ सम्मान वापस लौटाए !
राहुल हासिजा                         


बाज़ार ने कूच किया...

बाज़ार ने कूच किया,
शिक्षा पे वार किया,
स्वदेशी का बहिष्कार किया,
सभ्यता को ताड़-ताड़ किया...!
पैदल को मोटर कार किया,
लालच को २ से ४ किया,
रिश्तो का कारोबार किया,
बाज़ार ने कूच किया...!
देसी को अस्वीकार किया,
उपभोक्ता को उपभोक्तावाद किया,
शर्म से शर्मसार किया,
बाज़ार ने कूच किया...!


- राहुल हासिजा

13.12.09

लालच की शॉपिंग

अरी बहन सुनो, आज हम दीवाली की खरीददारी कर ए.सी. व टी.वी. लाए ! अजी आज हमारे पड़ोसी दीवाली के मौके पर नये सामान लाए हैं, हम चल कर आज और भी बड़ा ए.सी. व टी.वी लाते हैं ! यह है मेरा दिखावे का समाज...जहाँ ए.सी., टी.वी., फ्रिज, कार आदि घर की प्रतिष्ठा व सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं ! यह माना जाता है कि इन वस्तुओं के होने से परिवार का औदा समाज में उँचा होता है ! यह दिखावे का खेल शुरू तो होता है, परंतु ख़त्म होने का नाम नही लेता ! यही कारण है की दीवाली में लक्ष्मी माँ आने कि बजाय चले जाती हैं ! इन वस्तुओं से खुशी की प्राप्ति सिर्फ़ २ दीनो की है, क्योंकि २ दिन बाद पड़ोसी हमसे बड़ी टी.वी. खरीद लेगा ! गाँधीजी ने कहा था कि इस दुनिया में हर किसी की ज़रूरतों के लिए तो सब वस्तुएँ हैं, पर उनके लोभ के लिए नहीं !
इस दीवाली क्यों ना अपने अंदर के खरीददार शैतान को शांत करें और महसूस करें कि खुशी इन वस्तुओं के भोग में नहीं, पर आपके परिवार के साथ बिताए पलों में है ! क्यों ना अपने हाथों से कुछ बनाकर किसी को भेंट करें और महसूस करें उस अपरंपार खुशी को जो इस दीवाली में और भी मिठास भर देगी ! अगर आपका पुराना टी.वी., फ्रिज, मोबाइल, कंप्यूटर आदि सही अवस्था में है तो फिर नये खरीदने की क्या आवश्यकता ! अगर आपको अपने पैसों का निवेश कहीं करना ही है तो क्यों ना अपने पड़ोसियों के साथ मिल कर अपने पास के बगीचे को अपने बच्चो के लिए खेलने योग्य बनाए या फिर संगीत और नृत्य सभा का आयोजन कीजिए जहाँ आप अपने परिवार के साथ खुशियों के पल बिता सके ! हम से अपने अनुभव बाटियें कि किस प्रकार आपने यह दीवाली कुछ अलग ढंग से मनाई ! आपके इस विषय पर सुझाव सदेव आमंत्रित हैं! आप सब को दीवाली एवं नये वर्ष की ढेरों शुभकामनायें !

- राहुल हासिजा

टी.वी. की बीमारी



क्या आप किसी चोर, बलात्कारी या अशलीलता को किसी भी रूप में अपने घर में प्रवेश करने देंगे? क्या आप चाहेंगे की कोई अशलील फोटोग्राफ आपके ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाए? अगर आप नहीं, पर टी.वी. में सेंध लगाए बैठी बड़ी-बड़ी कंपनिया निर्णय ले कि आप क्या भोजन करें, क्या देखे, क्या पहने, क्या सुने, तो आपको कैसा लगेगा? आपको लगता हैं कि टी.वी. से पूरे संसार की जानकारी मुफ़्त में मिल जाती है, लेकिन क्या आपको पता है कि इसकी आपको बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है ! टी.वी के ज़रिए आप पर उपभोक्तावाद लादा जाता है ! आपके दिमाग़ पर ऐसी चीज़ों के प्रति मोह उत्पन्न किया जाता है, जो कभी भी आपकी ज़रूरत नही रही होगी ! किसी को टी.वी. की बुराई सुनाए तो कहते हैं कि "हम तो डिस्कवरी और वाइल्ड लाइफ वाले चॅनेल देखते है"! पर सच यह हैं कि यह चॅनेल भी दूसरो के अनुभवों को हम तक पहुचाते है, पर हम खुद अनुभव करने से वंचित रह जाते है !
लेकिन अगर आप टी.वी. बंद कर देते हैं, तो आपका एक प्रश्न होगा कि टी.वी. नही तो क्या करे? समय कैसे व्यतीत करें? आप एक बार टी.वी. बंद करके तो देखें, घर की रौनक लौट आएगी ! मिल बैठकर गपशप कीजिए, घर में खाने का कुछ मिलकर बनाएँ, परिवार के साथ संगीत की सभा का आयोजन करें हर रात को और देखिए कैसे आपके घर का माहौल खुशियों से खिल उठता है ! तो फिर देर किस बात की, आइए आज से ही इसकी शुरुआत करें ! मन् में कुछ विचार या शंका हो तो 'मिट्टी' की टीम से चर्चा कर सकते हैं और 'टी.वी. नहीं, तो क्या?’ विषय पर पर एक कार्यशाला का भी आयोजन कर सकते हैं ! 

- दिनेश कोठारी